मेरा नाम अहमद है। मैं लाहौर से सटे एक छोटे शहर में एक FMCG कंपनी में सेल्स एक्जीक्यूटिव था। कंपनी का नाम ‘फ्रेशलाइफ प्रोडक्ट्स’ था – डिटर्जेंट, शैंपू, साबुन जैसी चीजें सप्लाई करती थी। हमारा काम था छोटे-छोटे दुकानदारों को डीलर बनाना। हर नए डीलर से 1000 रुपये सिक्योरिटी ली जाती थी – रिफंडेबल, लेकिन कंपनी के अकाउंट में जमा करवानी पड़ती थी। रसीद मैं खुद बनाता था, और पैसे कैश में लेता था। ज्यादातर दुकानदार 500-1000 के नोट देते थे। कभी-कभी 2000 का नोट भी आ जाता, लेकिन ज्यादातर छोटे नोट।
मैं तीन साल से वहाँ था। सैलरी 25,000 रुपये। घर में माँ-बाप, छोटा भाई। पापा रिटायर्ड टीचर थे, माँ घर संभालती थीं। जिंदगी चल रही थी, लेकिन हमेशा पैसों की किल्लत। एक दिन शाम को, करीब 6 बजे, मैंने एक पुराने दुकानदार चाचा गुलाम हुसैन से डील फाइनल की। उन्होंने 1000 रुपये का नया नोट दिया। मैंने रसीद काटी, उन्हें स्टॉक का ऑर्डर दिया। घर लौटते वक्त मन में सोचा – कल सुबह बैंक जाकर जमा करवा दूँगा।
लेकिन उसी रात 11 बजे माँ की तबीयत बिगड़ गई। सीने में तेज दर्द, साँस फूल रही थी। पापा घबरा गए। मैंने तुरंत नजदीकी क्लिनिक पर फोन किया। डॉक्टर ने कहा – एंजाइना का अटैक हो सकता है, इंजेक्शन लगाना पड़ेगा। दवाई की दुकान पर गया। कुल 950 रुपये लगे – इंजेक्शन, टैबलेट्स, कुछ और। मेरे पास सिर्फ 400-500 रुपये थे। बाकी वही 1000 का नोट निकाला और खर्च कर दिया। मन में आया – कल किसी से उधार लेकर जमा करवा लूँगा। लेकिन अगले दिन सुबह माँ की हालत ठीक हुई, लेकिन मैं ऑफिस जाने के चक्कर में भूल गया।
तीन दिन बीत गए। ऑफिस में सब नॉर्मल था। लेकिन चौथे दिन दोपहर करीब 3 बजे पीओन अब्दुल्लाह आया। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
“अहमद भाई, मैडम आपको बुला रही हैं। अभी। केबिन में। बहुत गुस्से में लग रही हैं।”
रुबिना मैडम। ब्रांच हेड। उम्र 39, लेकिन दिखती 30-32 की। लंबी, गोरी, फिगर परफेक्ट। हमेशा सूट या साड़ी में, मेकअप क्रिस्प, बात में अथॉरिटी। ऑफिस में सब उन्हें ‘मैडम’ कहते थे। सलीम साहब उनके पति थे – कंपनी के डायरेक्टर, ज्यादातर लाहौर ऑफिस में रहते थे। रुबिना मैडम यहाँ की बॉस थीं।
मैं केबिन में घुसा। वो खिड़की के पास खड़ी थीं। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। शीशे पर बूँदें सरक रही थीं। उनकी सफेद सिल्क ब्लाउज थोड़ी भीगी लग रही थी – शायद कार से उतरते वक्त बारिश लगी हो। वो मुड़ीं नहीं। बस बोलीं –
“रशीद को पता चल गया है। वो कह रहा है तुमने 1000 रुपये लिए, लेकिन जमा नहीं करवाए। वो तुम्हें आज ही निकालना चाहता है। मैंने रोका है। कहा है सलीम साहब कल शाम लाहौर से आ रहे हैं, तब फैसला होगा।”
मेरा दिल धड़क गया। पैर काँपने लगे। रशीद अकाउंट्स वाला था – सख्त, झगड़ालू। वो मुझे पहले से पसंद नहीं करता था।
मैं कुछ बोल नहीं पाया। बस सिर झुकाए खड़ा रहा।
फिर वो पलटीं। उनकी आँखें गहरी, लेकिन उसमें गुस्सा नहीं – एक अजीब सी चमक। जैसे कोई प्लान हो।
“आज शाम 8 बजे हमारे डिफेंस वाले बंगले पर आ जाना। एड्रेस मैसेज कर दूँगी। अकेले। कोई बहाना मत बनाना।”
मैंने बस ‘जी मैडम’ कहा और बाहर निकल आया। पूरा दिन टेंशन में रहा। घर जाकर माँ से बात की, लेकिन कुछ बताया नहीं। रात 7:30 बजे मैडम का मैसेज आया – “डिफेंस फेज 5, प्लॉट 112। गेट पर नाम बोल देना।”
शाम 8 बजे मैं वहाँ पहुँचा। बारिश थम चुकी थी। हवा में ठंडक और मिट्टी की खुशबू। गेट ऑटोमैटिक खुला। लॉन में सोलर लाइट्स जल रही थीं। मुख्य दरवाजा खुला था। रुबिना मैडम खड़ी थीं।
टाइट मिडनाइट ब्लू जीन्स, जो उनकी पतली कमर और गोल कूल्हों को बिल्कुल हाईलाइट कर रही थीं। ऊपर ऑफ-शोल्डर ब्लैक क्रॉप टॉप, गहरा V-नेक, जिसमें उनकी गोरी गर्दन, कॉलरबोन और थोड़ा-सा क्लीवेज चमक रहा था। बाल खुले, हल्की कर्ली लहरों में। होंठों पर डार्क बेरी लिपस्टिक। हाथ में क्रिस्टल ग्लास में व्हिस्की। वो हल्के से झूम रही थीं। आँखें थोड़ी लाल, नशा साफ झलक रहा था।
“आ गए आखिरकार, अहमद…” मुस्कान के साथ बोलीं। आवाज मीठी, लेकिन गहरी। “अंदर आओ। डरो मत।”
मैं अंदर गया। लिविंग रूम लग्जरी था – मार्बल फ्लोर, बड़े सोफे, दीवार पर एब्सट्रैक्ट पेंटिंग्स। लेकिन वो सीधे बेडरूम की तरफ ले गईं। कमरा बड़ा, डिम येलो लाइट्स। हवा में वेनिला कैंडल्स की खुशबू और उनकी परफ्यूम – क्रिएड अवेंटस जैसी महक। किंग साइज बेड पर डार्क ग्रे सिल्क शीट्स। साइड टेबल पर जॉनी वॉकर ब्लू लेबल की बॉटल, आइस बकेट, दो ग्लास – एक में आधा भरा।
वो बेड के किनारे बैठ गईं। ग्लास उठाया, एक लंबा सिप लिया। फिर मेरी तरफ देखा।
“बैठो ना। इतना तनाव क्यों?”
मैं पास बैठा। उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ पर रखीं – गर्म, नरम। नाखून लंबे, रेड पॉलिश।
“ये क्या किया तुमने? 1000 रुपये क्यों नहीं जमा करवाए?” आवाज में डाँट थी, लेकिन उसमें एक कोमलता भी।
मैंने सब बता दिया – माँ की इमरजेंसी, दवाई, इरादा लौटाने का। आँखें नम हो गईं।
वो चुप रहीं। फिर उठीं, बेडसाइड अलमारी से पर्स निकाला। दो 1000 के नोट।
“ये लो। एक जमा करवा दो। दूसरा रख लो। इमरजेंसी के लिए। और आगे कभी पैसों की जरूरत हो… मुझसे कह देना। मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ, अहमद। जो मुझे अच्छा लगता है, उसे मैं जाने नहीं देती।”
मैं हैरान। “मैडम… ये… मैं…”
उन्होंने मेरे गले में बाहें डाल दीं। उनका बदन मेरे बदन से सटा। साँसें गर्म, व्हिस्की की महक।
“मैडम छोड़ो। आज से रुबिना। या रूबी। हम अब दोस्त हैं ना?”
और फिर उनके होंठ मेरे होंठों पर। हल्का किस। मैं फ्रीज हो गया। लेकिन उनका स्पर्श जादुई था। मैंने भी उन्हें कस लिया। किस गहरी हुई। उनकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। नशे ने उन्हें और बोल्ड बना दिया।
उन्होंने मुझे बेड पर धकेला। ऊपर झुककर मेरी गर्दन, कान चूमने लगीं। मैंने उनकी कमर पकड़ी।
“रूबी… कोई देख लेगा तो?”
“कोई नहीं है। सलीम लाहौर में मीटिंग में। बेटा लंदन में यूनिवर्सिटी। बेटी की शादी हो चुकी, वो दुबई में सेटल। आज सिर्फ तुम और मैं।” वो हँसीं। फिर मेरी शर्ट के बटन खोलने लगीं।
उनकी टॉप उतरी। काली लेस ब्रा में भरे हुए गोरे स्तन। ब्रा उतारी। मेरे हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रखे।
“छुओ… आज ये सिर्फ तुम्हारे। दबाओ…”
मैंने धीरे दबाया। मुलायम, गर्म। निप्पल्स सख्त। मैंने एक को मुँह में लिया। चूसा। वो सिसकारी – “आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही… ज़ोर से… उफ्फ़… मज़ा आ रहा है हनी…”
उन्होंने मेरी पैंट उतारी। मेरा लिंग हाथ में लिया। धीरे मसलने लगीं। “वाह… कितना सख्त… गरम… आज़मा लो रूबी को… चीख मत पड़ जाना।”