मेरा नाम अंकित है। मैं अठारह साल का जवान लड़का हूँ, कॉलेज का पहला साल चल रहा है। घर में भैया-भाभी के साथ रहता हूँ। भैया अक्सर बाहर रहते हैं, काम की वजह से। और घर की मालकिन हैं मेरी सुनीता भाभी – पैंतीस साल की, लेकिन देखने में पच्चीस की लगती हैं। गोरी-दूधिया रंग, मोटी-मांसल बदन, कसी हुई कमर, भारी-भारी नितंब और सबसे खास – उनके बड़े-बड़े, लटकते हुए स्तन। साड़ी पहनती हैं तो उनकी चूचियाँ ब्लाउज फाड़ने को तैयार रहती हैं। पूरे घर में सब उनसे डरते हैं। भैया भी उनकी सख्ती से परेशान रहते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा परेशान है हमारा नौकर गोविंद।
गोविंद तेईस साल का है – लंबा, तगड़ा, काला-कलूटा लेकिन बेहद मर्दाना। चौड़ी छाती, मोटी बाहें, और उसकी पैंट के अंदर जो उभार दिखता है, वो किसी भी औरत को पागल कर सकता है। भाभी उसे हर छोटी-मोटी बात पर डाँटतीं। “गोविंद, ये काम नहीं किया?” “गोविंद, कितनी बार बोलूँ?” कभी-कभी तो बिना वजह ही झाड़ लगातीं। गोविंद चुपचाप सब सह लेता, लेकिन उसके अंदर आग जल रही थी। मैंने कई बार देखा था – भाभी जब झुककर कुछ उठातीं, तो गोविंद की नजरें उनकी गांड पर टिक जातीं। या जब भाभी साड़ी संवारतीं तो उनकी चूचियों पर उसकी आँखें चिपक जातीं।
एक दोपहर की बात है। भैया किसी दोस्त से मिलने बाहर गए हुए थे। गर्मी का मौसम था, पंखा भी तेज चल रहा था। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था, मोबाइल पर कुछ देख रहा था। अचानक ड्रॉइंग रूम से भाभी की तेज, सख्त आवाज आई – “गोविंद! इधर आ!” मैंने दरवाजा थोड़ा सा खोलकर झाँका। गोविंद खड़ा था, सिर झुकाए। भाभी उसे कुछ काम न करने की वजह से बुरी तरह डाँट रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, ब्लाउज से उनकी भारी चूचियाँ उभरी हुई दिख रही थीं।
अचानक गोविंद ने आगे बढ़कर भाभी के घने, काले बालों को हल्के से पकड़ लिया। भाभी चौंक गईं। “क्या कर रहा है तू? पागल हो गया है? छोड़ मुझे!” उनकी आवाज में गुस्सा था, लेकिन गोविंद की आँखों में आज कुछ और ही चमक थी – वो दबी हुई भूख जो सालों से जल रही थी। वह धीरे से, लेकिन दृढ़ता से बोला, “मालकिन… बहुत दिन से तुम्हारी सख्ती सह रहा हूँ। तुम्हारी चीखें, तुम्हारी डाँट… अब बस। आज मेरी बारी है।”
भाभी ने हाथ-पैर मारे, विरोध किया, “छोड़! मैं चीख दूँगी!” लेकिन गोविंद ने उन्हें दीवार से सटाकर खड़ा कर दिया। उसका एक हाथ उनके बालों में था, दूसरा हाथ उनकी कमर पर, उन्हें अपनी तरफ खींचे हुए। उसने धीरे-धीरे भाभी की गरदन पर होंठ रख दिए, फिर चूमने लगा। भाभी काँप गईं, “नहीं… गोविंद… ये पाप है… छोड़ दे…” लेकिन उनकी साँसें तेज हो चुकी थीं। गोविंद ने उनकी बातों को अनसुनी कर दिया। उसने भाभी की ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए।
बटन खुले। भाभी की भारी-भारी, गोरी-गोरी चूचियाँ काले रंग की ब्रा में कैद दिखाई देने लगीं। गोविंद ने ब्रा का हुक खोला और नीचे सरका दिया। बाहर आ गईं दोनों बड़े-बड़े, गुलाबी निप्पल वाली चूचियाँ – भारी, नरम, हिलती हुई। गोविंद ने एक चूची को हथेली में भर लिया और हल्के से दबाया। भाभी के मुँह से अनायास ही “आह्ह्ह…” निकल गया। “देखो मालकिन,” गोविंद मुस्कुराया, “तुम्हारा बदन कितना प्यासा है… कितने दिन से ये चूचियाँ मेरे मुँह को तरस रही थीं।”
उसने झुककर एक चूची को मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे चूसने लगा, जीभ से निप्पल को घुमाने लगा, काटने लगा। भाभी की साँसें और तेज हो गईं। उन्होंने विरोध में हाथ मारा, लेकिन गोविंद ने दूसरे हाथ से उनकी दूसरी चूची को जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया। भाभी की आँखें बंद हो गईं। “उफ्फ़… गोविंद… मत करो… आह्ह्ह… ओह्ह… हाँ…” उनकी आवाज में अब दर्द नहीं, बल्कि प्यास थी।
गोविंद ने भाभी को धीरे से फर्श पर लिटा दिया। उनकी साड़ी ऊपर सरकाई। भाभी की मोटी, चिकनी, गोरी जाँघें और सफेद पैंटी दिख गई। गोविंद ने पैंटी को एक झटके में उतार दिया। भाभी की बिना बाल वाली, गुलाबी-गुलाबी चूत अब पूरी तरह नंगी थी – थोड़ी सी गीली हो चुकी थी। गोविंद ने अपनी उँगली से हल्के से चूत की फाँक को छुआ। भाभी काँप उठीं, “नहीं… वहाँ मत छू… आह्ह्ह…” लेकिन गोविंद ने झुककर चूत की ऊपरी फाँक को चाटना शुरू कर दिया। जीभ अंदर-बाहर करने लगा, चूसने लगा। भाभी अब खुद ही जाँघें फैला रही थीं। “आह्ह्ह… गोविंद… क्या कर रहा है… उफ्फ़… हाँ… यही… और गहरी… आह्ह्ह… मैं पागल हो रही हूँ…”
गोविंद ने अपनी पैंट उतार दी। उसका लंड – मोटा, लंबा, करीब नौ इंच का, काला और नसों वाला – खड़ा होकर तन गया था। भाभी की आँखें फैल गईं। “इतना बड़ा… नहीं… ये अंदर नहीं जाएगा…” लेकिन गोविंद ने भाभी को टेबल पर झुकाया। भाभी अब खुद ही अपनी साड़ी ऊपर कर रही थीं। गोविंद ने लंड का सिरा भाभी की चूत पर रगड़ा, फिर धीरे-धीरे अंदर डाल दिया। भाभी की चूत पूरी तरह भर गई। “आआह्ह्ह्ह… कितना मोटा है… उफ्फ़… गोविंद… फट जाएगी मेरी चूत… आह्ह्ह…”
गोविंद ने धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ भाभी की भारी चूचियाँ जोर-जोर से हिल रही थीं। भाभी अब चीख नहीं, मोहक आहें भर रही थीं – “हाँ… और जोर से… आह्ह्ह… चोद मुझे… मैं तेरी हूँ आज… तेरी रंडी हूँ…” गोविंद ने रफ्तार बढ़ाई। भाभी की चूत से चिकनाई निकल रही थी, आवाजें “पच-पच” कर रही थीं। उसने भाभी की कमर पकड़कर पीछे से तेज-तेज धक्के मारे। भाभी की मोटी गांड हर धक्के पर लहरा रही थी। “आह्ह्ह… गोविंद… मैं तेरी गुलाम हूँ… जो कहेगा वो करूँगी… बस मत छोड़ना… चोदते रहो मुझे…”
गोविंद ने भाभी को उठाकर अपनी गोद में ले लिया। भाभी ने अपनी दोनों जाँघें गोविंद की कमर पर लपेट लीं। लंड अब भी चूत के अंदर था। गोविंद उन्हें उठाकर किचन तक ले गया। वहाँ काउंटर पर बिठाकर बिना रुके चोदता रहा। भाभी का बदन पसीने से तर था। उनकी चूचियाँ गोविंद के सीने से रगड़ खा रही थीं। “हाँ… किचन में ही चोद… मैं तेरी हूँ… आह्ह्ह…”
फिर स्टोर रूम में ले जाकर गोविंद ने भाभी को दीवार से सटाकर खड़ा किया और पीछे से फिर चोदने लगा। भाभी अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। वे खुद पीछे गांड हिला रही थीं। “हाँ… मेरी गांड भी मार… मैं तेरी रंडी हूँ आज…” गोविंद ने भाभी की गांड पर हल्के से थपकी मारी और लंड को चूत से निकालकर गांड के अंदर सरका दिया। भाभी ने पहले हल्का सा “आह्ह्ह…” कहा, फिर खुद ही गांड पीछे की ओर धकेलने लगीं। “उफ्फ़… दर्द हो रहा है… लेकिन अच्छा लग रहा है… और गहरी… चोद मेरी गांड…”
मैं सब कुछ अपने कमरे से छिपकर देख रहा था। मेरा लंड पत्थर की तरह खड़ा हो गया था। भाभी को इस हालत में देखकर मुझे यकीन नहीं हो रहा था – वही सख्त मालकिन, जो कभी किसी को नहीं मानती थीं, आज नंगी होकर गोविंद के लंड पर चढ़ी हुई चीख-चीख कर चुद रही थीं।
बाथरूम में भी उन्होंने चुदाई की। गोविंद ने भाभी को शावर के नीचे खड़ा करके चोदा। पानी उनके बदन पर बह रहा था। भाभी की चूचियाँ चमक रही थीं, पानी की बूँदें उनकी निप्पल से टपक रही थीं। गोविंद ने भाभी को घुटनों पर बैठाकर अपना लंड मुँह में दिया। भाभी ने बिना हिचकिचाहट चूसना शुरू कर दिया – गला भरकर, जीभ घुमाकर। “मुझे पिला दो… सब पिला दो…” गोविंद ने भाभी के मुँह में ही जोर-जोर से झड़ दिया। भाभी ने सारा गाढ़ा, गर्म रस पी लिया, एक बूँद भी नहीं छोड़ी।
फिर बेडरूम में आखिरी राउंड। गोविंद ने भाभी को कुत्ते की तरह बनाया। भाभी ने खुद साड़ी ऊपर करके अपनी मोटी, सफेद गांड फैला दी। गोविंद ने लंड चूत में डाला और तेज-तेज चोदने लगा। भाभी चीख रही थीं – “आह्ह्ह… मार डाला… हाँ… और जोर से… मैं तेरी गुलाम हूँ गोविंद… हमेशा तेरी रहूँगी… चोदते रहो मुझे… कभी मत छोड़ना…” गोविंद ने भाभी की चूचियों को पीछे से पकड़कर खींचा और आखिरी बार जोरदार झटके दिए। दोनों एक साथ झड़ गए – भाभी की चूत से रस बह रहा था, गोविंद का लंड उनके अंदर दूध उगल रहा था।
उस दिन के बाद भाभी पूरी तरह बदल गईं। अब वे गोविंद को कभी नहीं डाँटतीं। बल्कि जब भी मौका मिलता, भाभी खुद गोविंद को बुलातीं – “गोविंद… कमरे में आ…” और चुपके से उससे चुदवातीं। कभी किचन में खड़े-खड़े, कभी बाथरूम में शावर के नीचे, कभी बेडरूम में पूरी रात। मैं सब छिपकर देखता रहता। भाभी अब खुशी-खुशी गोविंद की गुलाम बन गई थीं – और ये गुलामी उन्हें बहुत पसंद आ रही थी। उनकी आँखों में अब वही पुरानी सख्ती नहीं, बल्कि एक नई चमक थी – चुदाई की चमक।
और मैं… मैं रोज देखता हूँ और सोचता हूँ – काश मैं भी गोविंद की जगह होता। लेकिन फिलहाल, ये गुप्त तमाशा देखकर ही मेरा लंड खड़ा हो जाता है।







